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Sunday, 31 August 2025

Article on : राष्ट्र निर्माण में स्व का बोध (Rashtra Nirman Me Swa ka Bodh)


 *“यूनान, मिश्र, रोम, सब मिट गए जहां से, बाकी बचा है अभी नामो निशां हमारा।*
 *कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा”।।* 
स्व” का शाब्दिक अर्थ “अपना” या “स्वयं” है। यह किसी व्यक्ति की अपनी पहचान, आत्मा, या व्यक्तित्व, को दर्शाता है। यह एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो किसी व्यक्ति के आंतरिक होने का बोध कराती है। “स्व” के विभिन्न पहलू हैं, जिसमें व्यक्तिगत स्व, सामाजिक स्व, आध्यात्मिक स्व, सांस्कृतिक स्व शामिल हैं। संक्षेप में कहें तो स्व” एक व्यापक शब्द है जो किसी व्यक्ति के भीतर की सभी चीजों को समाहित करता है, जिसमें उसकी पहचान, भावनाएं, विश्वास, और मूल्य शामिल हैं।
स्व के अंतर्गत राष्ट्रनिर्माण में अपनी भूमिका निभाने वाले पक्ष:-
स्वदेश (स्वदेशी):
स्वदेशी दो शब्दों से मिलकर बना है: स्व (अपने) और देश (देश)। इसका अर्थ है “अपने देश का” या “अपने देश में निर्मित”। यह केवल वस्तुओं के उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अपने देश की संस्कृति, मूल्यों, और परंपराओं को अपनाना भी शामिल है। आज के दौर में स्वदेशी की जब भी चर्चा होती है, तो एक ही बोध सामने आता है अपनी माटी, अपनी माटी की उपज, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराएं, अपने देश में बनी हुई चीजें और उनका ही इस्तेमाल। स्वदेशी को लेकर स्थापित इस बोध या सोच की बुनियाद करीब एक सौ बीस साल पुरानी है।
1905 में जब अंग्रेजों ने सांप्रदायिक और धार्मिक आधार पर बंगाल का विभाजन किया, जिसे इतिहास में बंग-भंग आंदोलन के नाम से जाना जाता है, इसी के साथ स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ और ब्रिटिश वस्तुओं और उद्योगों का बहिष्कार करके अपने देश में बनी वस्तुओं का उपयोग करने का एक प्रयास हुआ। आंदोलन का उद्देश्य देश को आत्मनिर्भर बनाना और विदेशी शासन से मुक्त करना था। महात्मा गांधी ने स्वदेशी को “स्वराज की आत्मा” कहा था। लोकमान्य तिलक, रवींद्रनाथ टैगोर, और महात्मा गांधी आदि स्वतंत्रता संग्राम के द्योतक ने स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया। मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए साहस और संयम की पराकाष्ठा पार करने वाले स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने राष्ट्रहित को अखिल भारतीय चेतना बनाने में अविस्मरणीय योगदान दिया। भारतीय समाज को अस्पृश्यता के दंश से मुक्त कर एकता के मजबूत सूत्र में पिरोने हेतु वीर सावरकर जी ने आजीवन समर्पित कर दिया। स्वदेशी आंदोलन ने देश को जहां एक किया, वहीं अपनी उपज, अपनी पैदावार, अपनी दस्तकारी के प्रति लोगों को नए सिरे से सम्मोहित किया। उसी स्वदेशी आंदोलन की उपज खादी भी है। खादी तब से स्वदेशी का प्रतीक बनी हुई है।
भारत में स्वदेशी आंदोलन को नया मौका पिछली सदी के नौंवे दशक में शुरू हुए उदारीकरण ने दिया। उदारीकरण और बहुराष्ट्रीयकरण ने भारत को स्वदेशी की तरफ नए सिरे से सोचने को प्रेरित किया। स्वदेशी जागरण मंच के प्रेरक दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने स्वदेशी स्थापना की ओर लोगों का मार्गदर्शन किया। इसी दौर में आजादी बचाओ आंदोलन भी जन्मा। आजादी बचाओ आंदोलन के संस्थापक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राध्यापक रहे बनवारी लाल शर्मा को लगा कि बहुराष्ट्रीयकरण और औद्योगिकरण के साथ ही विदेशी वस्तुओं से भारतीय बाजार के पट जाने के बाद भारत कालांतर में अपनी आजादी खो देगा। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले भारत में कारोबार बढ़ाया और आर्थिकी पर कब्जा करने में सफल रही, जिसके खिलाफ आंदोलन तो बहुत चला। इन आंदोलनों की वजह से एक बार फिर भारत में स्व की सोच और आकर्षण भी बढ़े। वर्तमान में “मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया” व “आत्मनिर्भर भारत” की ओर बढ़ते हमारे कदम स्वदेश व स्वदेशी भावना को पूर्णरूपेण स्थापित करते हैं।
स्वभाषा:
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
स्वभाषा का अर्थ है अपनी भाषा, या वह भाषा जो व्यक्ति स्वाभाविक रूप से बोलता है, जिसे उसकी मातृभाषा या प्रथम भाषा भी कहा जाता है। यह शब्द किसी व्यक्ति की अपनी भाषा, उसकी संस्कृति और पहचान से जुड़ा हुआ है। स्वभाषा में अपनी मातृभाषा का उपयोग, वैश्विक स्तर पर अपनी भाषा की पहचान व सांस्कृतिक विरासत का परिचय, अपनी भाषा में शिक्षा ग्रहण, स्वभाषा में रचनात्मक कार्य व विकास आदि इसके मुख्य पहलू हैं। निज भाषा में व्यवहार करना, मातृभाषा में पढऩा, बोलना, समझना, जानना, बताना और समझाना सभी प्रकार की उन्नति, विकास और समृद्धि का मूल यही है। भारत एक भाग्यशाली देश है, जहां संस्कृत, तमिल, मराठी, हिंदी, गुजराती, मलयालम, पंजाबी आदि जैसी अनेक भाषाएं सदियों से भारतीय संस्कृति-परंपरा और जीवन संघर्षों को आत्मसात करते हुए अपनी भाषिक यात्रा में निरंतर आगे बढ़ रही हैं। भाषाओं की विविधता देश की अनोखी संपदा है। खुसरो, सूर, कबीर, विद्यापति, तुलसी, जायसी, मीरा, रैदास, रहीम, रसखान और जाने कितने ही महान कवियों ने हिंदी में ऐसा अमर साहित्य रचा, जो समय बीतने के साथ भी ताजा बना रहा।
अंग्रेजों के जाने के बाद भी औपनिवेशिक मानसिकता भारत में टिकी रही। स्वराज का स्वाभिमान, दायित्व और गौरव ‘इंडिपेंडेंस’ के अर्थ में स्वच्छंदता का रूप लेने लगा। परिणामस्वरूप हिंदी, जो एक व्यापक जन समुदाय की भाषा थी, सारे देश को जोड़ने वाली थी, अपनी सामर्थ्य, सम्मान और प्रसार को नहीं पा सकी। 1947 में अंग्रेज तो चले गए, लेकिन अंग्रेजियत अब भी जीवन के हर हिस्से में प्रभावी है। भारतीय ज्ञान, विज्ञान और उसकी श्रेष्ठता के प्रति संशय और अविश्वास, औपनिवेशिक मानसिकता का फल है। दासता, सभ्यता की हो या संस्कृति या फिर भाषा या जीवन दर्शन की, यह व्यक्ति समाज और राष्ट्र दोनों के सच्चे स्वराज बोध में बाधक है। इसी के कुछ उदाहरण अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय, प्राइवेट शिक्षण संस्थान, कॉरपोरेट कंपनियां हैं, जहां आज भी सिर्फ अंग्रेजी का ही पूर्णतः बोलबाला है और अंग्रेजी को ही सर्वोच्च समझा जाता है, हिंदी में बातचीत व कार्य करने वाले को कमतर आंका जाता है।
अंग्रेजों की नीतियों के कारण भारतीय भाषाओं के बीच की समरसता और बहुभाषिकता की स्वीकृति के प्रति संदेह पैदा हुआ, जबकि भारत में भाषा संस्कृति के निर्माण, मनुष्य के बलिदान और स्वाभिमान तथा जीवन का साधन रही है। भारत में भाषा का लोकोत्तर चरित्र व परंपरागत इतिहास है। उसे ज्ञान के विस्तार, निर्मिति और विस्तार के लिए उपलब्ध साधन के रूप में देख सकते हैं। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक संपूर्ण राष्ट्र एकता के सूत्र में बंधता है। स्वतंत्रता का गौरव भाव सर्वत्र तभी आएगा, जब शासकीय व्यवस्थाओं से लेकर के परिवार जीवन तक हम पश्चिम से आरोपित जीवन मूल्यों व भाषा से मुक्ति प्राप्त करेंगे।
शिक्षा के भारतीयकरण का अभियान भी भाषा के माध्यम से ही होगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति इस प्रकार के दृढ़ विश्वास का प्रतिपादन करती है। भारत भारतीय भाषाओं में बोले, व्यवहार करे, पढ़े और अनुसंधान करे, तो दासता से सहज मुक्ति प्राप्त होगी। आज आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मुखर रूप से विचार किया जा रहा है। यह उद्यम देश को सशक्त बना सके, इसके लिए देश को उसकी भाषा लौटाने की जरूरत है। विश्व में अनेक देशों का अनुभव यही संकेत देता है कि देश की अखंडता, एकता, समृद्धि और गतिशीलता सबके मूल में भाषा की शक्ति का काम करती है। न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक जीवन के क्षेत्रों में स्वभाषा से ही जन-जीवन सुखी हो सकेगा और भाषाओं के बीच सौहार्द से ही अमृत काल का संकल्प देश को समृद्धि के पथ पर आगे ले जा सकेगा।
स्वभूषा (स्ववेशभूषा):
स्व वेशभूषा का मतलब है अपनी पसंद की पोशाक या कपड़े। अर्थात वह पोशाक जो हमारे राष्ट्र व देश की संस्कृति और परंपराओं को अग्रसर करती हो। अपने आचरण, अपने कार्यों में, दैनिक जीवन में अपने राष्ट्र की छवि को हम प्रतिपादित करें। अनेक रंग, रूप, बोली, परंपराएं, त्योहार, संस्कृति, सामाजिक परिवेश होते हुए भी हम सभी एक ही धागे में पिरोए हुए की भांति नजर आते हैं और अनेकता में एकता को परिभाषित करते हैं। भारतीय परिधान एक समृद्ध और विविध विरासत का हिस्सा हैं। उनमें विविधता है, जो क्षेत्र, संस्कृति और अवसरों के अनुसार बदलती रहती है। साड़ी, सलवार कमीज, लहंगा चोली, धोती-कुर्ता, और शेरवानी कुछ लोकप्रिय पारंपरिक परिधान हैं। भारतीय परिधान न केवल सौन्दर्यवादी व पहनने वाले की पहचान बताते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि वह किस क्षेत्र, संस्कृति और सामाजिक स्थिति से है। वे हमें अपनी जड़ों और विरासत से जोड़ते हैं। भारत में विभिन्न क्षेत्रों, संस्कृतियों और धर्मों के लोग रहते हैं। प्रत्येक क्षेत्र और समुदाय के अपने पारंपरिक परिधान हैं।
प्राकृतिक जीवन के सिद्धांत को देखा जाए तो पोशाक के संबंध में हमारे भारतीय मनीषियों को इसकी गहरी समझ थी। वे प्रकृति के इस नियम को जानते थे कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए वायु, सूर्य और प्रकाश का हमारी देह से जितना संपर्क होता रहे, उतना ही अच्छा है। मानव सभ्यता को कपास की खेती तथा उनसे निर्मित सूती वस्त्र भी भारत की ही देन है। 5 हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा के अवशेषों में चांदी के गमले में कपास, करघना तथा सूत कातना और बुनती का पाया जाना इस कला की पूरी कहानी दर्शाता है। वैदिक साहित्य में भी सूत कातने तथा अन्य प्रकार के साधनों के प्रयोग के उल्लेख मिलते हैं। कपास का नाम भी भारत से ही विश्व की अन्य भाषाओं में प्रचलित हुआ, जैसे कि संस्कृत में कर्पस, हिन्दी में कपास, हिब्रू में कापस, यूनानी तथा लेटिन भाषा में कार्पोसस। हर तरह के परिधानों का आविष्कार भारत में ही हुआ और भारतीय परिधानों का विकसित रूप ही आधुनिक परिधान हैं।
भारतीय वस्त्रों के कलात्मक पक्ष और गुणवत्ता के कारण उन्हें अमूल्य उपहार माना जाता था। खादी से लेकर स्वर्ण युक्त रेशमी वस्त्र, रंग-बिरंगे परिधान, ठंड से पूर्णत: सुरक्षित सुंदर कश्मीरी शॉल भारत के प्राचीन कलात्मक उद्योग का प्रत्यक्ष प्रमाण थे, जो ईसा से 200 वर्ष पूर्व विकसित हो चुके थे। कई प्रकार के गुजराती छापों तथा रंगीन वस्त्रों का मिस्र में फोस्तात के मकबरे में पाया जाना भारतीय वस्त्रों के निर्यात का प्रमाण है। आजकल, पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण, भारतीय परिधानों में भी बदलाव आ रहा है। पेंट, शर्ट, कोट और जींस को हम आधुनिक परिधान कहते हैं, पाश्चात्य नहीं। आधुनिकता और पाश्चात्यता में फर्क है। लोकमान्य तिलक और पण्डित मदनमोहन मालवीय अदालतों तथा इंग्लैंड की पार्लियामेंट तथा विभिन्न बैठकों में अपनी देशी पोशाक कुरता-धोती और पगड़ी पहनकर ही जाया करते थे। उन्होंने किसी दबाव अथवा प्रभाव से अपनी देशी वेशभूषा नहीं छोड़ी। जगत बंध बापू तो इसके आदर्श उदाहरण हैं। हम भारतीयों को यदि अपने राष्ट्र वेश विन्यास के प्रति आस्था नहीं है तो हम तन से तो स्वतंत्र हो गये किन्तु मन से अभी भी अंग्रेजों के गुलाम बने हैं।
भाषा, भूषा, भोजन और भजन से ही हमारी पहचान है। मुगल और अंग्रेजों ने पहले हमारी भाषा बदली, फिर हमारी भूषा बदली और अब हम मुगल, पाश्चात्य संगत, संगीत के दीवाने हैं। बाजार से भारतीय व्यंजन, पेय पदार्थ और देसी खानपान लगभग गायब हो गया है। पारंपरिक परिधान अभी भी भारत में बहुत लोकप्रिय हैं, खासकर त्योहारों और विशेष अवसरों पर अधिकतर पारंपरिक परिधान व वेशभूषा को ही धारण किया जाता है। 
स्वधर्म और राष्ट्र:
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है कि “श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥“ जिसका अर्थ है, “अच्छी तरह से आचरण किए गए परधर्म (दूसरे का धर्म) की तुलना में गुणहीन स्वधर्म (अपना धर्म) श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भयदायक है”।
स्वधर्म का अर्थ है, “अपना धर्म” या “अपने कर्तव्य का पालन करना”। यह एक व्यक्ति के लिए निर्धारित मार्ग है, जो उसके स्वभाव, क्षमताओं और सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। यह एक ऐसा मार्ग है जो व्यक्ति को उसके जीवन के उद्देश्य की ओर ले जाता है। “राष्ट्र स्वधर्म” का अर्थ है “राष्ट्र का धर्म” या “देश का कर्तव्य”। यह शब्द राष्ट्रीयता और धार्मिकता को एक साथ जोड़ता है, यह दर्शाता है कि एक व्यक्ति के लिए अपने राष्ट्र के प्रति क्या कर्तव्य हैं, और यह कर्तव्य अक्सर धार्मिक या नैतिक सिद्धांतों पर आधारित होते हैं। राष्ट्रधर्म राष्ट्रीयता और धार्मिकता के बीच एक संबंध स्थापित करता है। जैसे कि देश के प्रति निष्ठा, कानून का पालन, सामाजिक जिम्मेदारी, और दूसरों के प्रति सम्मान। राष्ट्रधर्म का पालन करना एक व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसे एक जिम्मेदार और उपयोगी नागरिक बनाता है। यह देश की प्रगति और विकास में भी योगदान देता है। संक्षेप में, “राष्ट्र स्वधर्म” एक व्यापक अवधारणा है जो राष्ट्रीयता, धार्मिकता, और सामाजिक जिम्मेदारी को जोड़ती है।
राष्ट्रधर्म में बस निष्पक्ष होकर राष्ट्र की सेवा की जाती है। प्राचीन भारत में सनातन वैदिक हिन्दू धर्म को राज्याश्रय प्राप्त होने के कारण यह राष्ट्र (व्यावहारिक) तथा परमार्थिक (आध्याति्मक) दृष्टि से प्रगति के पथ पर था । इसलिए सुसंस्कृत एवं समृद्ध समाज, उत्तम वर्ण व्यवस्था, आचार-विचारों की शुद्धि, आदर्श कुटुंब व्यवस्था इत्यादि की स्थापना यहां हिन्दू धर्म आधारित राष्ट्र में हुई थी । परंतु स्वतंत्रता के 6 दशकों के पश्चात भी ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र’ की प्रशंसा करने वाले सर्वदलीय राजनेताओं के लिए सुसंस्कृत समाज एवं समृद्ध राष्ट्र की स्थापना करना संभव नहीं हुआ । स्वतंत्रता के काल से ही इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है; हिन्दू धर्म पर आधारित ‘हिन्दू राष्ट्र’ स्थापित करने की अनिवार्यता भी आवश्यक है।
पंचखंड भूमंडल में ‘भरतखंड (भारत)’ सर्वाधिक पुण्यवान है; क्योंकि यहां हिन्दू (सनातन) धर्म का असि्तत्व है। महर्षि अरविंद ने कहा था, ‘‘हम भारतीयों के लिए हिन्दू धर्म ही राष्ट्रीयता है । इस हिन्दू राष्ट्र का जन्म हिन्दू धर्म के साथ ही हुआ है तथा उसके साथ ही इस राष्ट्र को गति प्राप्त होती है । हिन्दू धर्म के विकास से ही इस राष्ट्र का विकास होता है। ‘राष्ट्र’ एक ऐसा जनसमूह है, जिसकी भाषा, धर्म अथवा पंथ, परंपरा, भूप्रदेश और इतिहास एक होता है; तथापि, राष्ट्रीयता निर्माण होने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात होती है उस समाज के एक ‘राष्ट्र’ होने की दृढ इच्छाशकि्त । राष्ट्र और राष्ट्रीयता के मूलतत्त्वों एवं लक्षणों की कसौटी पर हिन्दू समाज की ओर देखने से ही, ‘हिन्दू राष्ट्र’ की अवधारणा स्पष्ट होती है । भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा वैदिक है । यहां की सर्व भाषाएं संस्कृत भाषा से उत्पन्न हुई हैं । इसीलिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक सर्व धार्मिक विधियां वैदिक पद्धति से और संस्कृत भाषा में की जाती हैं । इसीलिए भारत भूमि केवल हिन्दुबहुल भूमि नहीं, यह एक स्वयंभू ‘हिन्दू राष्ट्र’ है । हिन्दुस्थान पहला देश होगा, जिसे ‘मातृभूमि’ के नाम से जाना गया । प्रभु श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।’ अर्थात ‘माता एवं मातृभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ हैं !’ शिकागो (अमेरिका) से लौटते समय भारतीय तट निकट आने पर स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘‘इस क्षण मेरी प्रिय मातृभूमि से आने वाली पवन ही नहीं; धूलि भी मुझे बहुत प्रिय लग रही है” । आज भी ‘वन्दे मातरम्’ का उच्चारण करते समय हिन्दू भारतभूमि के समक्ष नतमस्तक होते हैं।
स्वराज:
भारत में सदियों से वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा रही है, लेकिन इस सोच में भारत का भाव किसी को गुलाम बनाने का भाव नहीं रहा है। जब हम किसी को परिवार मानते हैं तो उसमें किसी को गुलाम या अधीन बनाने का भाव नहीं होता। आज निश्चित रूप से भारत में स्वराज, स्वबोध और सुराज को लेकर एक सकारात्मक विमर्श खड़ा हुआ है। भारत में हिंदी के प्रति सर्वत्र सकारात्मक दृष्टि दिखाई दे रही है। अपनी भाषा, अपनी सभ्यता संस्कृति पर न केवल गर्व करना, अपितु उसे जीवन व्यवहार में उतारना हमारा कर्तव्य है। यही वास्तविक स्वबोध है और यही वास्तविक स्वराज है। भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवन के सभी क्षेत्रों में स्वीकृति बने, भारतीय मूल्य व्यवस्था को समाज जीवन में स्थान प्राप्त हो और सर्वत्र स्वदेशी, स्वभाषा, स्वधर्म, स्वभूषा और स्वबोध की भावना निर्मित हो। इसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक पवित्र प्रण की तरह स्वीकार करना ही चाहिए। वस्तुत: यह प्रण स्वभाषा, स्वदेशी और स्वबोध के साथ सर्वत्र दासता के चिह्नों से मुक्ति का उपक्रम है।
वर्तमान में प्रत्येक नागरिक को वैचारिक क्रान्ति की दिशा में सार्थक प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके लिये स्व-राज के स्थायी भाव का जागरण करके नव-चैतन्य का संचार करना होगा। दुर्भाग्यवश, स्वाधीनता के पश्चात नेताओं और जनता में स्व का पूर्णत: लोप हो गया था। हम पराधीनता के पाश से तो जैसे-तैसे छुटकारा पा गये, परन्तु स्वतन्त्र नहीं हुए। प्रत्येक राष्ट्र का स्व उसकी प्रकृति होता है। स्व में व्यक्ति और राष्ट्र को गढ़ने की क्षमता होती है। प्रत्येक राष्ट्र जब अपने जन, जंगल, जमीन, जल और संस्कृति के परिवेश में तंत्र का विकास करता है तब सुशासन की स्थापना होती है। हमारे चेतना-वाहक स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, लोकमान्य तिलक तथा महात्मा गांधी ने स्वदेश, स्व-राज का गुणगान ही नहीं किया वरन् उसी में रामराज्य की अवधारणा के दर्शन किये। उसके पीछे लोकमंगल तथा लोक-चेतना का भाव निहित था। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने स्वतन्त्र की सुन्दर व्याख्या की है। उनका कहना था कि स्वतन्त्रता और परतन्त्रता का अन्तर शासन के सूत्रों का विदेशियों या स्वदेशियों के हाथों में रहना मात्र नहीं है। महत्वपूर्ण यह जान लेना है कि एक विदेशी शासक सुशासन दे सकता है पर स्वराज नहीं दे सकता। गीता में स्व के संदर्भ में कहा गया है कि अपने धर्म के अनुसार चलना स्वतंत्रता है। स्व-राज तब आयेगा जब स्व-तन्त्र की स्थापना होगी और स्वतन्त्रता से सुशासन स्थापित होगा। हम स्वाधीन तो हो गए हैं पर अभी पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं हुए हैं।

Wednesday, 12 June 2024

article on "पर्यावरण संरक्षण और इको फ्रेंडली तकनीक एवम् उपाय"




‘ॐ पूर्णभदः पूर्णामिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’
अर्थात् हमें प्रकृति से उतना ही ग्रहण करना चाहिए, जितना की आवश्यक है। प्रकृति को पूर्ण रूप से नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। हमारे बड़े बुजुर्ग इसी भावना से बिना पौधों को नुक़सान पहुंचाए तुलसी की पत्तियां ले लेते हैं। कुछ ऐसा ही संदेश वेदों में भी दिया गया है।
पर्यावरण यानि ऐसा आवरण जो हमें चारों तरफ से ढंक कर रखता है, जो हमसे जुड़ा है और हम भी उससे जुड़े हैं और हम चाहें तो भी खुद को इससे अलग नहीं कर सकते हैं। प्रकृति और पर्यावरण एक दूसरे का अभिन्न हिस्सा हैं। पर्यावरण और प्रकृति हमें बहुत कुछ देते हैं, लेकिन बदले में हम उन्हें क्या दे रहे हैं? हम अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए पर्यावरण और इसकी अमूल्य संपदा का हनन करने पर लगे हुए हैं। हमारे द्वारा कि गई हर अच्छी और बुरी गतिविधि का असर पर्यावरण पर पड़ता है। इस पृथ्वी पर मानव को सबसे अधिक बुद्धिशील प्राणी माना गया है। लेकिन वह सबसे खतरनाक प्राणी की श्रेणी को प्राप्त करता जा रहा है। पर्यावरण के संरक्षण की जिम्मेदारी भी मनुष्य की ही बनती है।
प्रकृति का संरक्षण करना मतलब उसका पूजन करने के समान है। हमारे देश में पर्वत, नदी, वायु, अग्नि, जल, ग्रह नक्षत्र, पेड़-पौधे आदि मनुष्य की जिंदगी से जुड़े हुए हैं। हरे भरे लहलहाते पेड़, आसमान में कलरव करते और चहचहाते पक्षी, जंगल में दौड़ते जीव जंतु, समन्दर में आती और जाती हुई लहरें, कल-कल करके बहती हुई नदियां आदि प्रकृति की अमूल्य कृतियां इस धरा पर मनोरम अहसास करवाती हैं। समय के साथ मनुष्य नित नए अविष्कार कर रहा है। परन्तु उसका हर्जाना भुगत रहे हैं, ये पर्यावरण और इसमें रहने वाले अबोध जीव। हम सभी को पर्यावरण और प्रकृति का संरक्षण करने के लिए जागरूक होना पड़ेगा, अन्यथा पर्यावरण के साथ सारी मानव जाति का भी विनाश हो जाएगा।
विभिन्न प्रकार के प्रदूषण इस समय पृथ्वी पर काबिज हैं। इन सभी से पार पाने में इको फ़्रेंडली यानि की पर्यावरण हितैशी उत्पादों व तकनीकों का प्रयोग अत्यंत लाभदायक है। इनमें से कुछ तकनीक व उपाय इस प्रकार हैं:-
• पौधरोपन के द्वारा:- अकसर ऐसा बार- बार कहा जाता है, पौधे लगाएं जीवन बचाएं। क्योंकि पर्यावरण संरक्षण में पेड़ पौधों का निरंतर योगदान रहा है। शुद्ध वायु, भरपूर मात्र में ऑक्सीजन, भूमि प्रदूषण रोकथाम, विशाल मात्रा में धूँए को सोखने का कार्य, असंख्य जीवों को शरण देने का कार्य, शाकाहार का एकमात्र स्रोत आदि पेड़ पौधों के इस पृथ्वी पर अनगिनत योगदान हैं। इसलिए हमें चाहिए कि घर की खाली जमीन, बालकनी, छत पर पौधे लगायें; लोगों को बर्थडे, त्योहार पर पौधे उपहार स्वरूप भेंट करें, महंगे एयर प्युरीफायर की बजाय हवा साफ करने वाले पौधे लगायें।
• जैविक खाद :- हम अपने गमलों, जमीन में लगे पौधों, खेतों आदि में ऑर्गैनिक खाद, गोबर खाद या जैविक खाद का उपयोग करेंगे तो केमिकल से आजादी भी पाएंगे और शुद्ध भोजन व पर्यावरण संरक्षण में साथ देंगे। हम घर से निकलने वाला गीला कचरा किसी जगह इकट्ठा कर या जमीन में दबा कर जैविक खाद में तब्दीलीकरण कर प्रयोग में ला सकते हैं।
• दैनिक दिनचर्या में जैविक उत्पाद का प्रयोग:- हमें चाहिए कि हम कपड़े के बने झोले-थैले लेकर निकलें। कागज़, गत्ते, कपड़े जैसी जैविक वस्तु से बनी वस्तुएं सफाई आदि के कार्य में प्रयोग करें। साज सज्जा में पर्यावरण हितैषी वस्तुओं का प्रयोग हमारे द्वारा हो। बांस, कांच व स्टील आदि धातु से बने बर्तनों का प्रयोग, प्लास्टिक बोतल की जगह कांच, स्टील, बांस या तांबे की बॉटल का प्रयोग करें, प्लास्टिक कप, प्लेट की जगह मिट्टी के कुल्हड़, कागज या पत्ते के बने प्लेट अपनायें।
• सफर के दौरान पर्यावरण हितैषी आदतों को अपनाना:- आस-पास जाने के लिए बाइक की बजाय साइकिल से या पैदल जायें और विद्युत वाहनों का प्रयोग करने की कोशिश करें। खुद की गाड़ी के बजाय ट्रेन, बस, मेट्रो, शेयर कैब आदि सार्वजनिक वाहन से यात्रा करें।
• प्राकृतिक ऊर्जा स्रोतों व उत्पादों का उपयोग:- प्राकृतिक रोशनी का आनंद लें, खिड़की से पर्दे हटायें, दिन में सूरज की रोशनी से काम चलायें। वायु व जल से संचालित उपकरणों का प्रयोग करें। हम ऐसे घर बनाएं जो हवादार हों और जहां सूर्य की रोशनी पर्याप्त मात्र में आती हो।
• सौर ऊर्जा का प्रयोग:- सौर ऊर्जा से संचालित उपकरण व सोलर पैनल लगवायें, सोलर कुकर में खाना बनायें। सौर ऊर्जा प्रकृति की देन है और हमें निशुल्क प्राप्त होती है और साथ ही यह प्रदूषण रहित है।
• जल का सदुपयोग:- पर्यावरण संरक्षण के लिए जल का सदुपयोग अति आवश्यक है। जल है तो कल है, जल ही जीवन है; इसे सिर्फ सूनने या बोलने मात्र तक ही सीमित न रखें, बल्कि अपने जीवन में भी उतारें। खुले नल को बंद करें, शॉवर लेने की बजाय बाल्टी से नहायें, जल कपड़ा धोने से बचे पानी को पौधों में डाल दें या जमीन धोएं, मंजन या शेविंग करते समय मग में पानी लें, नल न चलायें। नदियों के पानी को जहरीले रसायनों की चपेट में आने से हमें बचाना होगा और पर्यावरण हितैषी उत्पादों का प्रयोग करना होगा। नदी, नालों में गंदगी डालने से हमें बचना होगा।
• विद्युत ऊर्जा का व्यवस्थित प्रयोग:- कमरे से निकलने पर टीवी, लाइट, पंखा, एसी बंद कर दें। अच्छे 5 स्टार रेटिंग वाले उपकरण खरीदें, लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों का उपयोग करें, बिना उपयोग मोबाईल, लैपटॉप चार्जर को प्लग में न लगे रहने दें। बल्ब की जगह पर सीएफ़एल या एलईडी बल्ब लगायें। इन सभी उपायों से विद्युत ऊर्जा बचेगी और साथ ही हमारे प्राकृतिक स्रोत भी ठीक प्रकार उपयोग होंगे।
• जल का सदुपयोग:- पर्यावरण संरक्षण के लिए जल का सदुपयोग अति आवश्यक है। जल है तो कल है, जल ही जीवन है; इसे सिर्फ सूनने या बोलने मात्र तक ही सीमित न रखें, बल्कि अपने जीवन में भी उतारें। खुले नल को बंद करें, शॉवर लेने की बजाय बाल्टी से नहायें, जल कपड़ा धोने से बचे पानी को पौधों में डाल दें या जमीन धोएं, मंजन या शेविंग करते समय मग में पानी लें, नल न चलायें। नदियों के पानी को जहरीले रसायनों की चपेट में आने से हमें बचाना होगा और पर्यावरण हितैषी उत्पादों का प्रयोग करना होगा। नदी, नालों में गंदगी डालने से हमें बचना होगा।
• विद्युत ऊर्जा का व्यवस्थित प्रयोग:- कमरे से निकलने पर टीवी, लाइट, फैन, एसी बंद कर दें। अच्छी इलेक्ट्रिसिटी सेविंग रेटिंग वाले उपकरण खरीदें, लिफ्ट की बजाय सीढ़ियों का उपयोग करें, बिना उपयोग मोबाईल, लैपटॉप चार्जर को प्लग में न लगे रहने दें। बल्ब की जगह पर सीएफ़एल या एलईडी बल्ब लगायें। इन सभी उपायों से विद्युत ऊर्जा बचेगी और साथ ही हमारे प्राकृतिक स्रोत भी ठीक प्रकार उपयोग होंगे।
• शाकाहार अपनाकर:- शाकाहारी बनें, मांसाहार का सेवन कम करें या बंद करें। इससे कार्बन फुट्प्रिन्ट भी कां होगा एवं मुर्गी, मछली अन्य खाद्य जीवों के पालन में खर्च होने वाली अत्यधिक ऊर्जा का संरक्षण भी होगा और साथ ही वृक्षारोपण बढ़ेगा।
• उत्पादों के रियूज को अपनाकर :- प्लास्टिक के खाली डब्बों में सामान रखें या पौधे लगायें, पुनर्प्रयोग में लाए जाने वाले सिलिकॉन के थैले का इस्तेमाल करें व अन्य उत्पादों का प्रयोग करें जैसे कि बांस, धातु, लकड़ी आदि।
• रीसाइकल किए जाने वाले उत्पाद का इस्तेमाल :- ऐसे बहुत से उत्पाद हैं जिन्हें रीसाइकल कर प्रयोग में लाया जा सकता है, जैसे रीसाइकल कागज के बने उत्पाद का प्रयोग, साफ सफाई में रीसाइकल हुए कपड़े का प्रयोग। आजकल प्लास्टिक को रीसाइकल कर सड़क आदि निर्माण भी किया जा रहा है। धातु को पिघलाकर दोबारा वस्तुएं बनाई जा रही हैं। इन सभी उपायों को अपनाकर पर्यावरण संरक्षण किया जा सकता है।
• शून्य अपशिष्ट का पालन :- शून्य अपशिष्ट अर्थात किसी भी प्रकार का अवशेष न रहे। इसके लिए हम कृषि उपजात (बाइप्रोडक्ट) को अन्य कार्यों में प्रयोग कर सकते हैं। जैसा कि गेहूं कटने के बाद रह जाने वाले अपशिष्ट को विभिन्न प्रकार के उत्पाद जैसे गद्दे आदि बनाने में प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलावा अतिशुक्ष्मवाद (minimalism) को अपनाना अत्यधिक लाभप्रद है। अगर कुछ भी वस्तु का प्रयोग हो, तो उसका समुचित इस्तेमाल हो।
• नवीनीकरणीय (renewable) संसाधनों का बचाव:- जल, वृक्ष, विभिन्न प्रकार की ऊर्जा, प्राकृतिक स्रोत आदि का इस्तेमाल व्यवस्थित रूप में करना हमारा ध्येय होना चाहिए। जैसे कि कागज के दोनों तरफ प्रिन्ट लें, फालतू प्रिन्ट न करें,। खाद्य पदार्थ की क्षति पर रोकथाम करें। हमें चाहिए कि हम खाने की बर्बादी न करें। खाने की थाली में उतना ही डालें जीतने की आवश्यकता हो।
• रसायन रहित उत्पादों का प्रयोग:- पानी में घुलनशील पदार्थ से बनी पैकिंग का प्रयोग, जैविक प्लास्टिक यानि बेयोप्लास्टिक का प्रयोग, पर्यावरण हितैषी स्याही व कागज का प्रयोग करें। प्राकृतिक, जैविक उत्पादनक इस्तमल करें व रसायनिक चीजों के प्रयोग से बचें।
• पर्यावरण अनुकूल फरनीचर, विद्युत उपकरण का उपयोग:- हमे चाहिए कि घर में ऐसे फर्नीचर व उपकरण लें, जो पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाएं एवं प्रदूषण संरक्षण में अपना योगदान दें। प्राकृतिक संसाधनों व उपकरणों का हम प्रयोग करें।
• जैव निम्नीकरणीय (बायोडेग्रेडेबल) उत्पाद का प्रयोग:- पहनने के लिए सूती कपड़ों का उपयोग करें, कचरा डालने के लिए आसानी से नष्ट हो जाने वाली थैली का प्रयोग करें। सिंथेटिक चीजों से बचें। जैविक उत्पादों का इस्तेमाल करें।
• कार्बन फुटप्रिंट कम करके ऊर्जा में बचत:- पर्यावरण को सबसे अधिक डर कार्बन फुटप्रिन्ट का है। बढ़ती तकनीक के साथ ऐसे बहुत से उत्पादों का मानव प्रयोग करने लगा है, जिससे कार्बन फुट्प्रिन्ट बढ़ रहा है। जिससे ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशिअरों के पिघलने आदि की समस्या को हमने न्यौता दिया है। इसलिए हमें इस ओर कदम उठने होंगे, जिससे इनसे निजात पा सकें।
• तापवरोधक भवन का निर्माण (energy efficient room with proper insulation):- कुछ ऐसी पर्यावरण हितैषी तकनीकों को अपनाकर ऐसे मकान का निर्माण किया जा सकता है जो तापवरोधन का काम करें, जैसे मकान में केमिकल वाले पैंट की जगह मिट्टी व कली के उपयोग, इंदौर पौधों का प्रयोग, वर्टिकल व रूफ़टोप गार्ड्निंग जैसे प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर भवन व ईमारतों का निर्माण किया जा सकता है।
• वैकल्पिक ऊर्जा (Alternative energy) का प्रयोग :- यानि कि व्यर्थ हो जानेवाली ऊष्मा को उपयोग में लाया जा सकता है | गाड़ियों के एग्ज़ॉस्ट पाइप या एयर-कंडिशनर से निकलनेवाली ऊष्मा को कैद करके बिजली बनाई जा सकती है। इस काम में किस प्रकार की मिश्रधातुओं व सामग्री (Alloy material) का उपयोग किया जाना चाहिए इसे लेकर अभी बहुत सी बातें स्पष्ट नहीं हैं लेकिन इसपर काम किया जा रहा है और भविष्य में इसके अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है।
• पानी को नमकरहित बना कर (Desalinization of Sea Water):- दुनिया में ऐसी बहुत सी जगह हैं, जहां पानी बहुत मूल्यवान है। बहुत से क्षेत्र पानी की कमी का संकट झेल रहे हैं। कई जगहों में पानी का खारापन दूर करने के लिए प्लांट लगाए गए हैं लेकिन उनका उपयोग बहुत खर्चीला है । हमें ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी कि धरती में पानी की प्राकृतिक आपूर्ति में कमी न आने पाए। इस दिशा में काम कर रहे लोगों की सहायता करके हम प्रकृति संरक्षण में अपना मूल्यवान योगदान दे सकते हैं।
• महासागरीय ताप ऊर्जा रूपांतरण कर (Ocean Thermal Energy Conversion): - यह एक नई ऊर्जा तकनीक है जिसमें समुद्र के पानी में व्याप्त ऊष्मा को बिजली में बदलने की दिशा में काम किया जा रहा है। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि समुद्र में अनेक स्थानों पर पानी के तापमान में अंतर होता है। समुद्र की ऊपरी सतह गर्म और भीतरी सतहें ठंडी होती हैं। तापमान के इस अंतर से टरबाइनें चलाई जा सकती हैं जो जनरेटर की मदद से बिजली बनाती हैं। यह तकनीक अभी शैशवकाल में है और इसे अधिक सक्षम बनाने के प्रयास जारी हैं।
• 'प्रो-प्लैनेट पीपुल' (P3) मिशन:- इस मिशन की योजना व्यक्तियों का एक वैश्विक नैटवर्क बनाने की है, जो पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली को अपनाने और बढ़ावा देने के लिये, एक साझा प्रतिबद्धता होगी। मिशन - P3 समुदाय के माध्यम से एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने का प्रयास करेगा, जिससे पर्यावरण के अनुकूल व टिकाऊ व्यवहार सुदृढ़ हों। इस आन्दोलन के ज़रिये, वर्तमान में प्रचलित, 'उपयोग-और-निपटान' की ग़ैर-ज़िम्मेदार अर्थव्यवस्था को, परिपत्र अर्थव्यवस्था में बदलने की कोशिश की जाएगी, जिससे सावधानीपूर्ण व सतत उपयोग का विस्तार होगा।
वर्तमान में कोई भी पर्यावरण के संरक्षण का महत्व नहीं समझ रहा है। निरंतर प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, जिससे सारी पृथ्वी प्रदूषित हो रही है और मानव सभ्यता का अंत होने को है। इन परिस्थितियों पर विचार करते हुए व निवारण की ओर बढ़ते हुए समय समय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलनों का आयोजन किया जाता रहा है, जिनमें सन् 1972 में स्टॉककहोम सम्मेलन; 1992 में ब्राजील में व 2002 में जोहान्सबर्ग में पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन किया गया। पूर्व में जनसमूह द्वारा पर्यावरण व प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए विभिन्न आंदोलन भी चलाए गए; जिनमें 1973 में चिपको आंदोलन, 1983 में अप्पीको आंदोलन, 1989 में नर्मदा आंदोलन, मुख्यतः रहे।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों को विधि (कानून) बनाकर लागू करने के उद्देशय से भारत में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम संसद द्वारा 23 मई 1986 को पारित हुआ और 19 नवंबर 1986 को लागू किया गया।
विश्व स्वास्थ संगठन द्वारा जारी रिर्पोट के अनुसार वैश्विक जलवायु परिवर्तन से तापमान बढ़ रहा है, जिससे प्रदूषण का स्तर भी अधिक हो गया है। जिस कारण बहुत सी बीमारियाँ विशेषतः हार्ट अटैक, मलेरिया, डेंगू, हैजा, एलर्जी तथा त्वचिय रोग मानव जाती को अपनी चपेट में ले रही हैं। ऐसी परिस्थिति को देखते हुए विश्व स्वास्थ संगठन ने विश्व की सरकारों को अपने स्वास्थ्य बजट में कम से कम 20 प्रतिशत वृद्धि करने की सलाह दी है।
पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के लाभ व्यापक है, जो कि आर्थिक और सामाजिक आयामों में फैले हुए हैं। हरित क्रांति को आगे बढ़ाने में सरकारों, व्यवसाई वर्ग और व्यक्तिगत स्तर पर सभी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सतत विकास व इको फ़्रेंडली विकल्पों को अपनाकर, हम न केवल पर्यावरण व प्रकृति की रक्षा करते हैं बल्कि अपने जीवन की गुणवत्ता को भी बढ़ाते हैं, आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ, सतत संसार व ब्रह्मांड में पनपने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।